સાચો જવાબ:
कबीरदास जी ने धर्म में फैली कुरीतियों और बाह्य आडंबरों का तीव्र विरोध किया है। उन्होंने हिंदुओं के प्रात:काल स्नान, मूर्तिपूजा, पीपल-पूजन, छापा-तिलक और आसन लगाकर घमंड से बैठने का खंडन किया। वहीं मुसलमानों के टोपी-माला, किताबें पढ़कर मुरीद बनाना और कब्र-मज़ार दिखाने जैसे आडंबरों पर चोट की। कबीर का स्पष्ट मानना है कि ईश्वर की प्राप्ति बाह्य दिखावों से नहीं, बल्कि सच्चे आत्मज्ञान से होती है।