સાચો જવાબ:
इस पंक्ति के माध्यम से युधिष्ठिर भौतिकवादी और सत्तावादी सोच पर गहरा प्रहार करते हैं। वे कहते हैं कि ईंट-पत्थरों से बने किले, राजप्रासाद, स्मारक और निर्जीव पत्थरों पर उकेरे गए शिलालेख 'जड़' वस्तुएँ हैं। ये केवल मिट्टी और पत्थर जैसी निर्जीव चीज़ों की भव्यता को ही दर्शा सकते हैं; वे मनुष्य की संवेदना, भावना, दया, न्याय और आत्मिक चेतना ('चेतन') का प्रतिनिधित्व कभी नहीं कर सकते। यदि मनुष्य इन जड़ वस्तुओं के संग्रह और सफलताओं को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान लेता है, तो वह अपने चेतन व्यक्तित्व को खो बैठता है।