ધોરણ 8 | విષય: Hindi
हामिद अपने दोस्तों को चिमटा खरीदने के निम्नलिखित कारण बताता है:
चिमटा एक बहादुर शेर की तरह है जो आग, पानी, आँधी और तूफान में डटा रहेगा।
इसे कंधे पर रखो तो यह बंदूक बन जाता है और हाथ में ले लो तो फकीरों का चिमटा बन जाता है।
इससे मंजीरे का काम भी लिया जा सकता है।
खिलौने तो मिट्टी के हैं जो ज़रा सा गिरने पर चूर-चूर हो जाएँगे, पर चिमटा बरसों तक सुरक्षित रहेगा।
रुमाल के विविध प्रयोग निम्नलिखित हैं:
हाथ, मुँह और पसीना पोंछने के लिए।
धूप या धूल से बचने के लिए सिर या मुँह को ढँकने के लिए।
किसी चीज़ को छानने या पोटली बांधने के लिए।
चोट लगने पर खून रोकने या पट्टी बाँधने के लिए।
जादू के खेल दिखाने या किसी को विदा करते समय हाथ हिलाकर इशारा करने के लिए।
इस कहानी का मुख्य घटनाक्रम रमजान के महीने में 'ईदगाह' जाने की तैयारियों, वहाँ की नमाज़ और ईदगाह के बाहर लगे मेले के इर्द-गिर्द घूमता है। पूरी कहानी का ताना-बाना ईदगाह के इसी वातावरण से जुड़ा है, इसलिए इसका शीर्षक 'ईदगाह' रखा गया है, जो बिल्कुल उचित है।
इसके अलावा अन्य शीर्षक: 'हामिद का त्याग' या 'बहादुर चिमटा' या 'बाल-विवेक'।
कारण: क्योंकि पूरी कहानी में बाल-नायक हामिद की समझदारी, अपनी दादी के प्रति उसका गहरा त्याग और उसका चिमटा ही सबसे प्रमुख आकर्षक बिंदु बनकर उभरते हैं।
ऐतिहासिक और पौराणिक ग्रंथों में परोपकार के निम्नलिखित उदाहरण मिलते हैं:
महर्षि दधीचि ने मानव कल्याण तथा असुरों के संहार के लिए अपने शरीर की हड्डियों का त्याग कर दिया।
राजा शिबि ने कबूतर (पंडूक) के प्राणों की रक्षा के लिए अपने शरीर के अंग का दान कर दिया।
महर्षि दयानंद ने विष मिलाकर प्राण लेने वाले अपने रसोइए जगन्नाथ की जान धन देकर बचाई।
आश्रित × निराश्रित (या अनाश्रित)
अवनति × उन्नति
संसार के सभी धर्मों का मूल क्या है?
लोग परोपकार के कार्य के लिए किन-किन चीजों का निर्माण करवाते हैं?
महर्षि दयानंद ने अपने रसोइए जगन्नाथ की रक्षा किस प्रकार की?
| शब्द | समानार्थी शब्द | विरोधी (विलोम) शब्द |
|---|---|---|
| शीतल | ठंडा / शीतल | उष्ण / गर्म |
| प्रसन्न | खुश / आनंदित | अप्रसन्न / दुःखी |
| गरीब | निर्धन / दीन | अमीर / धनवान |
| अंधकार | अंधेरा / तम | प्रकाश / उजाला |
| स्नेह | प्रेम / प्यार | घृणा / नफ़रत |
| पुरानी | प्राचीन / पुरातन | नई / नवीन |
अर्थ: संकट से उबारना / उद्धार करना।
वाक्य प्रयोग: हे ईश्वर! इस कठिन परीक्षा में अब तुम्हीं मेरा बेड़ा पार लगाओ।
अर्थ: ज़रा सा भी नुकसान या नुकसान की खरोंच न आना।
वाक्य प्रयोग: इतनी भीषण दुर्घटना होने के बाद भी कार चालक का बाल बाँका नहीं हुआ।
अर्थ: बहुत दुःखी होना / शोक प्रकट करना।
वाक्य प्रयोग: हामिद के हाथ में चिमटा देखकर पहले तो अमीना ने छाती पीट ली।
अर्थ: बहुत अधिक दुःख पहुँचना।
वाक्य प्रयोग: अनाथ हामिद की गरीबी और उसकी बातें सुनकर किसी का भी दिल चीर जाए।
शीर्षक: सच्चा न्याय / न्यायप्रिय न्यायाधीश
एक समय की बात है, एक नगर में दो स्त्रियाँ रहती थीं। उन दोनों के बीच एक छोटे से मासूम बालक को लेकर भीषण तकरार (झगड़ा) शुरू हो गई। दोनों स्त्रियाँ उस एक ही बालक पर अपना-अपना दावा पेश कर रही थीं। पहली स्त्री कहती थी, "यह मेरा बच्चा है," तो दूसरी स्त्री चिल्लाती थी, "नहीं, यह मेरा बच्चा है।" बात इतनी बढ़ गई कि मामला सुलझने का नाम नहीं ले रहा था। अंत में यह विवाद नगर के न्यायाधीश (जज) के समक्ष पहुँचा।
न्यायाधीश महोदय ने दोनों स्त्रियों की बातों को बहुत ध्यान से सुना। कोई भी गवाह न होने के कारण यह तय करना मुश्किल था कि असली माँ कौन है। न्यायाधीश ने कुछ सोचा और एक अनोखा न्याय करने का ढोंग रचा। उन्होंने ज़ोर से कहा, "चूँकि इस बालक पर तुम दोनों का बराबर का दावा है, इसलिए इस बालक के दो टुकड़े करके दोनों में आधा-आधा बाँट लो।"
यह सुनते ही पहली स्त्री बिल्कुल मौन (शांत) रही, मानो उसे इस फैसले से कोई आपत्ति न हो। परंतु दूसरी स्त्री यह सुनते ही फूट-फूटकर रोने लगी। उसने रोते हुए न्यायाधीश के आगे हाथ जोड़ दिए और कहा, "हुज़ूर! दया करें, बच्चे को मत काटो! भले ही यह बच्चा मुझे न मिले, उसे जीवित रहने दीजिए, आप यह बच्चा उसी दूसरी स्त्री को ही सौंप दीजिए।"
न्यायाधीश तुरंत भाँप गए कि असली माँ कौन है। एक सच्ची माँ कभी भी अपने बच्चे को कटते हुए नहीं देख सकती। न्यायाधीश ने अपना अंतिम फैसला सुनाया और रोती हुई ममतामयी स्त्री को बालक सौंप दिया तथा झूठ बोलने वाली स्त्री को जेल भेज दिया।
सीख: माँ की ममता कभी झूठी नहीं हो सकती और बुद्धि से सच्चा न्याय किया जा सकता है।
कहानी की पूर्ति:
मौसम में ठंडक बढ़ने लगी थी। माँ सोचने लगी कि इस साल ढेर सारे स्वेटर बनाकर बेचने हैं जिससे अंकित की दसवीं कक्षा की फीस और पढ़ाई का खर्चा निकाला जा सके। अंकित के पापा नहीं थे। एक बड़ी बहन थी। अंकित अपने घर में समृद्धि लाने के लिए प्रतिदिन सोचता रहता है...
...कि वह किसी भी तरह अपनी माँ के काम में हाथ बँटाए। अंकित पढ़ाई में बहुत तेज़ था, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति को देखकर उसका मन कचोटता रहता था। उसने तय किया कि वह अपनी पढ़ाई के समय के बाद बचे हुए समय का सही उपयोग करेगा।
अंकित ने मोहल्ले के कुछ लोगों से बात की और अपनी माँ द्वारा बुने गए स्वेटरों के सुंदर डिज़ाइनों की तस्वीरें अपने मोबाइल से खींचकर सोशल मीडिया और आस-पास के व्हाट्सएप ग्रुप्स में डाल दीं। अंकित की इस तरकीब ने जादू का काम किया। माँ के हाथ के बने स्वेटरों की कला लोगों को बेहद पसंद आई और देखते ही देखते सर्दियों की शुरुआत में ही उनके पास स्वेटरों के ढेरों ऑर्डर्स आ गए।
अंकित की बड़ी बहन ने स्वेटरों की पैकिंग और फिनिशिंग का काम संभाल लिया, माँ दिन-रात बुनाई करतीं और अंकित स्कूल से आने के बाद खुद जाकर स्वेटरों की डिलीवरी करता था। उस साल ठंड के मौसम में उनकी बहुत अच्छी कमाई हुई। अंकित की दसवीं की फीस तो जमा हुई ही, साथ ही घर में खुशहाली और समृद्धि भी आ गई। अंकित की सूझबूझ और मेहनत ने साबित कर दिया कि अगर इरादे पक्के हों, तो हर मुश्किल राह आसान हो जाती है।