ધોરણ 9 | విષય: Hindi
अत्यल्प (अर्थ: बहुत थोड़ा)
वाक्य प्रयोग: इतनी कठिन मेहनत के बाद भी उसे अत्यल्प वेतन मिला।
चाकचिक्य (अर्थ: चकाचौंध)
वाक्य प्रयोग: हमें नगरों के भौतिक चाकचिक्य से दूर रहकर सादा जीवन जीना चाहिए।
कनकाभ (अर्थ: सोने जैसी चमक वाला)
वाक्य प्रयोग: महलों के कनकाभ शिखर केवल कबूतरों के रहने के काम आते हैं।
तपःक्षीण (अर्थ: तेज से हीन/दुर्बल)
वाक्य प्रयोग: अधिक सुख-सुविधाओं के अधीन रहने से मनुष्य तपःक्षीण हो जाता है।
क्लेश (अर्थ: दुःख/कष्ट)
वाक्य प्रयोग: जीवन में आने वाले क्लेशों का सामना धैर्य और साहस से करना चाहिए।
झंझावात (अर्थ: तूफान/तीव्र आँधी)
वाक्य प्रयोग: गरुड़ पक्षी झंझावातों में भी निर्भीक होकर उड़ता है।
फणिबंध (अर्थ: नागपाश/साँप का बंधन)
वाक्य प्रयोग: कर्ण ही दुर्योधन को विपत्तिरूपी फणिबंध से मुक्त करा सकता था।
धन-संपत्ति दूसरों में बाँटने, गरीबों को दान देने और परोपकार करने के लिए है; इसे अपने पास जमा रखने के लिए नहीं।
(1) पंक्तियाँ:
वैभव-विलास की चाह नहीं, अपनी कोई परवाह नहीं,
बस यहीं चाहता हूँ केवल, दान की देव सरिता निर्मल,
करतल से झरती रहे सदा, निर्धन को भरती रहे सदा।
भावार्थ: कर्ण श्री कृष्ण से कहता है कि मुझे धन-दौलत और सुख-सुविधाओं की कोई इच्छा नहीं है। मुझे अपने जीवन की भी परवाह नहीं है। मेरी केवल एक ही इच्छा है कि मेरे हाथों से दान की पवित्र नदी हमेशा बहती रहे और गरीब व असहाय लोगों की सहायता होती रहे।
(2) पंक्तियाँ:
मैं गरुड़, कृष्ण ! मैं पक्षिराज, सिर पर न चाहिए मुझे ताज,
दुर्योधन पर है विपद घोर, सकता न किसी विध उसे छोड़,
रणखेत पाटना है मुझको, अहिपाश काटना है मुझको।
भावार्थ: कर्ण कहता है कि हे कृष्ण! मैं गरुड़ पक्षी के समान हूँ जिसे सिर पर मुकुट या राजसिंहासन नहीं चाहिए। इस समय मेरे मित्र दुर्योधन पर भयंकर संकट आया हुआ है और मैं उसे किसी भी स्थिति में अकेला नहीं छोड़ सकता। मुझे युद्धभूमि में जाकर दुर्योधन के विपत्तिरूपी नागपाश को काटना है।
(1) कर्ण की अभिलाषा:
उत्तर: कर्ण अत्यंत उदार, निष्काम और दानवीर प्रवृत्ति का व्यक्ति है। उसे राज-पाठ, धन-संपदा, मुकुट या सांसारिक वैभव की कोई चाह नहीं है। उसकी एकमात्र अभिलाषा यह है कि उसके हाथों से दान की निर्मल धारा निरंतर बहती रहे और कोई भी निर्धन उसके द्वार से खाली हाथ न लौटे। वह गरुड़ की तरह कठिनाइयों में जीकर दूसरों के दुःख दूर करना चाहता है।
(2) कर्ण का मित्रधर्म:
उत्तर: कर्ण सच्चा और निष्ठावान मित्र है। दुर्योधन ने कर्ण को उस समय सम्मान और आश्रय दिया जब पूरा समाज उसे सूत-पुत्र कहकर अपमानित कर रहा था। जब श्री कृष्ण उसे पांडवों के ज्येष्ठ होने का रहस्य बताकर संपूर्ण राज्य का राजा बनाने का प्रलोभन देते हैं, तब भी कर्ण अविचलित रहता है। वह मित्र के कठिन समय में दुर्योधन का साथ छोड़ने से मना कर देता है और अपने मित्रधर्म को निभाने के लिए अपना जीवन तक न्योछावर करने को तैयार रहता है।
निर्मल × मलिन
निर्धन × धनवान (सधन)
प्रभूत × अत्यल्प
कोमल × कठोर
अमृत × विष (गरल)
| मूल शब्द | वर्ग पहेली से समानार्थी शब्द | वाक्य प्रयोग |
| सुखोपभोग | विलास | अत्यधिक विलास मनुष्य को आलसी बना देता है। |
| हथेली | करतल | दानवीर कर्ण के करतल से सदा दान बहता था। |
| प्रचूर | प्रभूत | हमारे देश में अन्न का प्रभूत उत्पादन होता है। |
| दरज | दरार | भूकंप के कारण दीवार में दरार पड़ गई। |
| आँधी | अंधड़ | शाम होते ही तेज़ अंधड़ चलने लगा। |
| पानी | वारि | पक्षी प्रपातों का शुद्ध वारि पीते हैं। |
| गरल | विष | शिवजी ने लोक कल्याण के लिए विष पिया था। |
| चट्टान | शैल | वीर पुरुष शैल की भाँति अटल रहते हैं। |
(1) यदि कोई जरूरतमंद इन्सान आपसे मदद माँगे तो आप क्या करते?
उत्तर: यदि कोई जरूरतमंद व्यक्ति मुझसे मदद माँगेगा, तो मैं अपनी क्षमता के अनुसार उसकी पूरी सहायता करने का प्रयास करूँगा। यदि उसे भोजन, कपड़े या पढ़ाई संबंधी मदद चाहिए तो स्वयं दूँगा, और यदि कोई बड़ी समस्या होगी तो अपने परिवार व मित्रों की सहायता से उसकी मदद करूँगा।
(2) आपको पता चले कि आपका दोस्त संकट में फँसा हुआ है तो आप क्या करेंगे?
उत्तर: यदि मुझे पता चलेगा कि मेरा दोस्त संकट में है, तो मैं बिना समय गँवाए तुरंत उसकी मदद के लिए पहुँचूँगा। कर्ण के मित्रधर्म से प्रेरणा लेकर मैं हर परिस्थिति में अपने दोस्त के साथ खड़ा रहूँगा और उसे उस संकट से बाहर निकालने का पूरा प्रयास करूँगा।
(3) आपके पास जरूरत से ज्यादा धन-संपत्ति है, तो क्या करेंगे?
उत्तर: यदि मेरे पास आवश्यकता से अधिक धन-संपत्ति होगी, तो मैं उसका उपयोग समाज कल्याण के कार्यों में करूँगा। मैं अनाथ बच्चों की शिक्षा, गरीबों के इलाज और असहाय लोगों के लिए आश्रय की व्यवस्था करूँगा तथा कर्ण की भाँति दान देकर निर्धनों की सेवा करूँगा।